होली रंगों के साथ मस्ती और उमंग का त्यौहार है एक ऐसा त्यौहार जिसकी कल्पना मात्र से ही अंग अंग ख़ुशी से झूम उठता है. होली यह शब्द सुनाने और बोलने में जितना पवित्र है उतना आज के परिद्रश्य में नजर नहीं आता है क्योंकि कुछ लोगों के मनाने का तरीका इस रंगा-रंग त्यौहार के रंग को फीका कर देता है.

हम इस त्यौहार को मनाने की मस्ती में इतना खो जाते है की सामने वाले की परेशानियों का ध्यान न रखकर अपने मनोरंजन के लिए किसी को भी अनजाने में नुकसान पहुंचा देते है.

होली आखिर क्यूँ : एक विचारणीय प्रश्न

आखिर क्यूँ और किस लिए? क्या हम इस त्यौहार को मनाने की सभ्यता खो चुके है? या फिर हमने वास्तविक होली की जगह किसी नई होली होली को जन्म दे दिया है जो इस त्यौहार को पवित्रता को समाप्त कर रहा है.

वास्तविकता तो यह है की हमारे समाज के कुछ गिने चुने तत्व जो त्यौहार को मस्ती का रूप देकर हर उस परंपरा को दूषित कर देते है जो किसी भी त्यौहार की पवित्रता को समाप्त कर देता है.

क्यों लोग इस पवित्र पर्व के दिन भांग-शराब आदि सेवन कर दूसरों की होली को ख़राब करते है? क्या एक दिन सिर्फ एक दिन हम इस त्यौहार को बिना किसी मादक पदार्थ के नहीं मना सकते है?

क्यूँ मस्ती के नाम पर ऐसे रंगों का प्रयोग जानबूझकर करते है जो किसी को भी नुकसान पहुंचा सकते है यहाँ तक कि किसी की आँख तक को नुकसान पहुंचा सकता है.

क्यूँ हम अपने बच्चों को रंग भरे गुब्बारों का प्रयोग नहीं करने को कहते है. इसमे हम भी कहीं न कहीं बहुत हद तक दोषी है.

दोस्तों मुझे मेरे अनुभव से लगता है जितनी शराब होली के दिन पी जाती है उतनी शराब साल के किसी भी दिन नहीं पी जाती है. मैंने देखा है शराब पीने वालों की नई पौध इसी त्यौहार से शराब पीना सीखती है. 14-15 साल तक के बच्चे मस्ती के नाम पर भांग व शराब तक से परहेज नहीं करते है आखिर क्यूँ?

टीवी से लेकर सिनेमा तक होली के पर्व का जो द्रश्य दिखाते है उनमे में भी भांग पीने का चित्रण किया जाता है. क्या बिना नशे के इस त्यौहार को मनाया नहीं जा सकता है?

आखिर क्यूँ मस्ती के नाम पर लोग एक दूसरे के कपड़े तक फाड़ने से नहीं हिचकते? क्यूँ लोग कीचड़ आदि का इस्तेमाल करने तक से नहीं हिचकते आखिर क्यूँ?

क्या हम इस पर्व को बिना किसी नशीले पदार्थ का सेवन किये मना सकते है. अज हम जो करते हैं उसका असर कहीं न कहीं हमारे अपने छोटे भाइयों या फिर हमारे अपने खुद के बच्चों पर भी पड़ता है.

हम अपने छोटे भाइयों या फिर बच्चों के लिए इस त्यौहार का कैसा स्वरुप प्रस्तुत कर रहें है हमें इस पर विचार करना चाहिए. और अपने से छोटो के लिए एक आदर्श प्रस्तुत करना चाहिए.

हमारा आज का आचरण हमारे कल के भविष्य का निर्धारण करता है. क्यूँ ना इस होली में प्रण लेते है….

हे प्रभु दो शक्ति हमें, भर दो खुशियों से झोली |
कर श्रेष्ट आचरण श्रेष्ट बने हम हो नशा मुक्त यह होली || 

अंत में कुछ पंक्तियों के साथ आपके लिए एक प्रश्न छोड़ कर जा रहा हूँ आखिर ऐसा क्यूँ है ?

अश्लीलता, निर्लज्जता संग  फूहड़ियों की टोली है

दे माँ बहनों की गाली कहते बुरा न मानो होली है  ||

चरस फूकते पैग लगाते कहीं भांग की गोली है

पड़े पड़े नाली से कहते बुरा ना मानो होली है ||

अगर आपको इस आखिर क्यूँ का जवाब पता हो तो आप हमें कमेंट्स में जरुर बताएं आखिर क्यूँ ? आपको मेरा ये लेख कैसा लगा हमें अपनी राय जरूर दे और अगर अच्छा लगा हो तो सोशल मीडिया पर अपने दोस्तों के साथ शेयर जरूर करे.

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