Dhanvantari Mantra के साथ करे Dhanteras puja

Dhanvantari Mantra Dhanteras puja
Dhanvantari Mantra Dhanteras puja

धनतेरस, धन्वन्तरी त्रयोदशी, नरक चतुर्दशी, दीपावली और भाईदूज इन पांच दिन होने वाले धार्मिक एवं पारंपरिक कार्य हमारे स्वास्थ्य और धन धान्य कि द्रष्टि से बहुत ही महत्वपूर्ण है. यह पर्व दीपवाली के आगमन का सूचक होता है.

धनतेरस के दिन नए बर्तन खरीदने की परम्परा रही है.  धनतेरस के दिन नए बर्तनो की खरीददारी करने के पीछे लोगों की धरणा यह है कि इससे उनके घरों में धन-धान्य एवं श्री कि वृद्धि होती है.

धनतेरस के अगले दिन चतुर्दशी को नरक चतुर्थी मनाया जाता है. एक कथा के अनुसार इस दिन हनुमान जी ने नरकासुर का वध किया था जिसकी वजह से नरक चतुर्थी मनाई जाती है.

  धनतेरस क्यूँ मनाया जाता है?  

धनतेरस का पर्व भगवान् धन्वन्तरी जयंती के नाम से भी जाना जाता है. यह पर्व दीपवाली के आगमन का सूचक होता है. भगवान् धन्वन्तरी को सूर्य भगवान् के सोलह शिष्यों में से एक माना जाता है. धनतेरस के दिन मृत्यु के देवता यमराज और भगवान धन्वंतरि की पूजा का बहुत ही ज्यादा महत्व है.

प्राचीन भारतीय वांगमय के अनुसार भगवान् धन्वन्तरी का अभिर्भाव देवासुर द्वारा समुद्र मंथन से हुआ था. औषधियाँ सहित क्षीराव्धि के जल को मंदराचल रुपी मथानी और वासुकी नाग रूपी नेती की सहायता से मथते हुए देव और असुरों को चौदह रत्न प्राप्त हुए.

जिसमे एक धन्वन्तरी का प्रादुर्भाव समुद्र के प्रान्त भाग में हुआ. इसके सन्दर्भ में एक संस्कृत का Dhanvantari mantra आता है “यथा धन्वंतरे संधवो ये श्रयतामिह वे द्विजा| संयुतः मुद्रान्ते मध्यामाने मृतेपुराः”.

हरिवंश पुराण से से भी इस तथ्य की पुष्टि होती है “जाताः सहिसमुद्रात, मध्य्माने पुरामृतै | उत्पन्न: जलशात्पर्व, शर्वतेश्च त्रिया वृताः” समुद्र  मंथन के बाद ये वस्तुएं आपस में परस्पर बाट ली गयी.

पुराणों के साक्ष्य के आधार पर धन्वन्तरी आयुर्वेद के प्रथम या आदि प्रवर्तक के रूप में जाने जाते है. आग्नेय और मत्स्य पुराण में उन्हें आयुर्वेद का प्रवर्तक कहा गया है. जिस प्रकार दीपावली लोगों के जीवन में नया प्रकाश लेकर आता है ठीक उसी प्रकार आयुर्वेद जगत में धन्वन्तरी जयंती का बहुत ही ज्यादा महत्त्व है.

आयुर्वेद के प्रवर्तक भगवान् धन्वन्तरी भगवान् सूर्य के सोलहवें शिष्य थे. भगवान् सूर्य ने धन्वन्तरी को आयुर्वेद का ज्ञान दिया दिया था. इसलिए भगवान् धन्वन्तरी को आयुर्वेद का आदि प्रवर्तक माना जाता है जिसकि वजह से आयुर्वेद चकित्सा पद्दति करने वाले चिकित्सक आज के भगवान् धन्वन्तरी की मंत्रो के साथ पूजा उपासना कर लोगों कि लम्बी आयु कि कामना करते है.

  धनतेरस पूजा कैसे करे  

सबसे पहले स्नान कर धुले हुए वस्त्र धारण करे. तत्पश्चात पूजा कक्ष में मिटटी का कलश स्थापित कर धन्वन्तरी मन्त्र का जाप करते हुए भगवान् धन्वन्तरी का आवाहन करे.

Dhanvantri mantra “देवान कृशान सुरसंघनि पीडितांगान दृष्ट्वा दयालुर मृतं विपरीतु कामः पायोधि मंथन विधौ प्रकटौ भवधो“.

इसके पश्चात ताम्बे या चांदी के चम्मच से कलश के चारों तरफ जल प्रवाहित करते हुए अक्षत पुष्प चढ़ाते हुए Dhanvantri mantra “पाद्यं अर्घ्यं आचमनीयं समर्पयामि” का जाप करे.

इसके पश्चात कलश को पंचामृत से नहलाते हुए इस Dhanvantari Mantra का जाप करें “पंचामृत स्नानार्थे पंचामृत समर्पयामि“.

इसके बाद धूप बत्ती और दीपक जलाकर इस Dhanvantari Mantra का जाप करें “पंचामृत स्नानान्ते शुद्धोधक स्नानं समर्पयामि

  Dhanvantari Mantra  

इसके बाद भगवान् धन्वंतरि से समस्त जीवों के स्वास्थ्य की मंगल कामना करते हुए इस मंत्र को धारण करे. मन्त्र को धारण करने का तात्पर्य मन्त्र को अपने जीवन में उतारना होता है.

भद्रम् कर्णेभिः शृणुयाम देवाः भद्रम् पश्येम अक्षभिः यजत्राः।
स्थिरैः अङ्गैः तुष्टुवांसः तनूभिः वि-अशेम देव-हितम् यत् आयुः ।।

भावार्थ: हे देववृंद, हम अपने कानों से कल्याणमय वचन सुनें. जो याज्ञिक अनुष्ठानों के योग्य हैं (यजत्राः) ऐसे हे देवो, हम अपनी आंखों से मंगलमय घटित होते देखें. नीरोग इंद्रियों एवं स्वस्थ देह के माध्यम से आपकी स्तुति करते हुए (तुष्टुवांसः) हम प्रजापति ब्रह्मा द्वारा हमारे हितार्थ (देवहितं) सौ वर्ष अथवा उससे भी अधिक जो आयु नियत कर रखी है उसे प्राप्त करें (व्यशेम). तात्पर्य है कि हमारे शरीर के सभी अंग और इंद्रियां स्वस्थ एवं क्रियाशील बने रहें और हम सौ या उससे अधिक लंबी आयु पावें.

इसके पश्चात कलश को प्रणाम करते हुए मिष्ठान का भोग लगाये और अपने प्रियजनों में प्रसाद को वितरित कर दे.

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